नेताओं की बड़ी बड़ी रैलियां ओर जनता के लिए कोरोना प्रोटोकाल का पालन अनिवार्य

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दिन ब दिन ओमिक्रॉन के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं जिसके चलते देश में दहशत का माहौल बन गया है। दुनिया भर के विशेषज्ञ इन बढ़ रहे मामलों को देखते हुए फरवरी माह में तीसरी लहर की भविष्यवाणी करने लगे हैं। इस माहौल में पहले से ही रोजी-रोटी के संकट से जूझ रहे करोड़ों लोगों को एक और लॉकडाउन लगने का डर अभी से सताने लगा है।

पिछले कुछ दिनों में ही ओमिक्रॉन के देशभर में 700 से भी ज्यादा मरीज सामने आ चुके हैं और यह आंकड़ा दिन प्रतिदिन तेजी से बढ़ रहा है। देश के कुछ राज्यों द्वारा ‘नाइट कर्फ्यू’ लगाए जाने की शुरुआत हो चुकी है। हालांकि विशेषज्ञों के मुताबिक इसमें ऑक्सीजन की जरूरत कम ही है लेकिन जिस प्रकार कई देशों में कोरोना संक्रमण की रफ्तार बढ़ाने वाला कोरोना का ओमिक्रॉन वेरिएंट डेल्टा से ताकतवर रूप में सामने आ रहा है, उससे तीसरी लहर की भविष्यवाणियों को लेकर चिंता का माहौल बनना स्वाभाविक ही है तथा समय रहते केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा प्रभावी उपाय किए जाने की सख्त आवश्यकता है।

दुनियाभर में फैलते ओमिक्रॉन के कहर को लेकर चिंताजक स्थिति यह है कि इसमें अब तक कुल 53 म्यूटेशन हो चुके हैं और यह डेल्टा के मुकाबले बहुत तेजी से फैलता है।  4 नवम्बर 2021 को जहां ओमिक्रॉन का पहला मामला दक्षिण अफ्रीका में सामने आया था, वहीं भारत सहित पूरी दुनिया में केवल एक महीने के अंदर ही यह 110 से भी ज्यादा देशों में फैल चुका है और इस एक महीने में दुनियाभर में इस वेरिएंट के लाखों मामले सामने आ चुके हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार डेल्टा वेरिएंट की आर वैल्यू 6-7 थी अर्थात् एक व्यक्ति वायरस को 6-7 व्यक्तियों में फैला सकता है जबकि ओमिक्रॉन की आर वैल्यू डेल्टा के मुकाबले करीब छह गुना ज्यादा है, जिसका अर्थ है कि ओमिक्रॉन से संक्रमित मरीज 35-45 लोगों में संक्रमण फैलाएगा।

भारत में ओमिक्रॉन का पहला मामला 2 दिसम्बर को सामने आया था और उसके बाद से मूल वायरस के मुकाबले तीन गुना से भी ज्यादा तेज रफ्तार से फैल रहा है। हमारे देश में यह स्थिति चिंतनीय इसलिए है क्योंकि कोविड सुरक्षा प्रोटोकॉल के पालन का सारा ठीकरा और सारी जिम्मेदारी केवल जनता के ही मत्थे मढ़ दिया जाता है। प्रधानमंत्री, गृहमंत्री से लेकर तमाम राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े नेता ओमिक्रॉन के बढ़ते खतरों को देखते हुए आम जनता को तो भरपूर ज्ञान की घुट्टी पिलाते नजर आते हैं मगर स्वयं रैलियों में हजारों-लाखों लोगों की भीड़ जुटाकर सारे कोरोना सुरक्षा प्रोटोकॉल की खुलकर धज्जियां उड़ाते हैं।

यदि चुनावी रैलियों में सभी राजनीतिक दलों द्वारा इसी प्रकार भारी भीड़ जुटाई जाती रही तो डर यही है कि कहीं फिर से वही हालात न पैदा हों, जैसे मार्च-अप्रैल में चुनाव प्रचार के लिए पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, असम, पुडुचेरी राज्य विधानसभा चुनावों की रैलियों में जुटाई गई भारी भीड़ के चलते हुए थे। लापरवाहियों के चलते भारत कोरोना की दूसरी लहर के दौरान तबाही का भयावह मंजर देख चुका है लेकिन जब भी इस ओर ध्यान दिलाया जाता है तो संबंधित राज्यों में नाइट कर्फ्यू जैसी पाबंदियां लगाकर कोरोना के खिलाफ सख्त कदम जैसी बातें होने लगती हैं लेकिन एक ओर जहाँ अधिकांश जगहों पर जहां रात में सड़कें पहले ही सुनसान रहती हैं, वहां नाइट कर्फ्यू लगाने से कैसा नियंत्रण होने की उम्मीद करी जा रही है।

दिन में शादी-ब्याह जैसे समारोहों में तो केवल 100-200 लोगों के इकट्ठा होने की लेकिन रैलियों में लाखों की भीड़ इकट्ठा करने की अनुमति होती है। अदालतें इसके लिए बार-बार फटकार लगाते हुए सचेत भी करती रही हैं किन्तु डर इसी बात का है कि कहीं महज कागजों तक ही सीमित कोरोना पाबंदियां तीसरी लहर को खौफनाक न बना दें।

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