मोदी हैं तो मुमकिन है

मनोज कुमार मिश्रा
मित्रों, मैं एक बात नहीं समझ पा रहा हूं कि पहले की सरकार में 1962, 1965, 1971 की भीषण लड़ाई भी हुई, पोलियो, प्ले, हैजा, टीबी जैसी महामारी भी हुई। जिनका मुफ्त में इलाज हुआ। राष्ट्रीय स्तर पर मुफ्त में पूरे देश का टीकाकरण हुआ। खरबो का घोटाला भी हुआ, काला धन विदेशों में भेजा गया, भ्रष्टाचार खूब व्याप्त रहा, फिर भी आम नागरिकों पर इसकी कभी आंच नही आई। बहुत सारे सरकारी कारखाने कंपनियां लगी, सरकारी अस्पताल, सरकारी कॉलेज, सरकारी स्कूल बनें। सभी को लगभग मुफ्त में या नाममात्र के पैसे में राशन, शिक्षा, उपचार, दवाईयां मिल जाती थी, सरकारी नौकरियों में कोई कमी नहीं रही। लोगों को नौकरियां दी गई। जो व्यक्ति मैट्रिक-इंटर पास कर जाता था उसे घर से बुलाकर नौकरियां दी गई। तनख्वाह में कोई कमी नहीं रही, भत्ता हमेशा लगातार बढ़ता था महंगाई भत्ता 131% तक दिया गया। सबसे अधिक वेतन वृद्धि छठे वेतनमान में मिली। सरकारी कर्मचारियों को पेंशन दिया जाता था। असंगठित व्यवसायियों के व्यापार, लघु, मध्यम व कुटीर उद्योग भी खूब फले-फुलें। देश की जीडीपी 8% से ऊपर थी।
आखिर यह सब गद्दार चोरों की सरकार कैसे कर लेती थी? जो दिव्य महापुरुष की सरकार नहीं कर पा रही है! जबकि विदेशों से काला धन वापस आ गया नोटबंदी से देश का काला धन वापस आ गया!
चोरों, बेईमानों की सरकार की बनाई गई सरकारी संपत्ति को भी बेचा जा रहा है तब भी दिव्य पुरुष की “ईमानदार” “कर्मठ” सरकार नौकरियां, वेतन भत्ते, पेंशन नहीं दे पा रही। उल्टा किसान, मजदूर और आम नागरिकों को टेंशन ही दे रही है।
सभी की नौकरियां चली गयी, सभी NGO से पैसा प्रधानमंत्री रिलीफ़ फ़ंड में ले जमा करवा लिया, कोई युद्ध भी नहीं हुआ, जीडीपी माइनस मे चल रही है। और डीजल पेट्रोल पर सब्सिडी की जगह सरकार टैक्स बढ़ा कर 50 रुपये प्रति लीटर और कमा रही है। इन्श्योरेंस और म्यूच्यूअल फण्ड पर भी 18% टैक्स से कमा रही है, देश का रिज़र्व बैंक में आपातकालीन जमा में से 175 अरब रुपये निकालकर खर्च कर दिये, सरकारी संस्थानों को बेच दिए, और फिर भी सरकारी खजाना खाली? अगर कोई बोल रहा है, तो उसको खालिस्तानी, पाकिस्तानी या देशद्रोही बोला जाता है।
मेरे ख्याल से युवाओं को कम से कम अब तो जाग जाना चाहिये। जो पढ़े लिखे होने का दम भरते हैं।

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